महाभारत काल से जुड़ी अनेक कथाओं में श्रीकृष्ण की करुणा, कर्तव्यनिष्ठा और दिव्य सामर्थ्य का अनोखा संगम दिखाई देता है। ऐसी ही एक गाथा है—अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पांडव वंश की अंतिम शिशु-कड़ी की रक्षा करने की, जब युद्धोपरांत क्रोध और प्रतिशोध की आग ने सब कुछ नष्ट कर देने की धमकी दे दी थी। श्रीमद्भागवत में वर्णित यह प्रसंग आज भी श्रद्धालुओं को यह विश्वास दिलाता है कि ईश्वर अपनी शरण में आए के जीवन की रक्षा हर परिस्थिति में करता है।
कौरव-पांडव युद्ध समाप्त हो चुका था। द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने रात के अंधेरे में सोए हुए पांचों उपपांडवों का वध कर दिया, जिससे दुःखी पांडव प्रतिशोध के लिए निकल पड़े। संघर्ष के दौरान जब अश्वत्थामा को पराजय निकट दिखी, तो उसने पांडव वंश का अंत करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। यह घातक अस्त्र किसी भी दिशा में लक्ष्य किया जा सकता था, और उसने इसे अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा की ओर मोड़ दिया, जहां पांडव वंश की अंतिम आशा पल रही थी।
ब्रह्मास्त्र के तेज से गर्भस्थ बालक के प्राण संकट में पड़ गए। उसी समय श्रीकृष्ण ने पांडवों की वंश परंपरा को बचाने हेतु सूक्ष्म रूप धारण किया और उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर दिव्य कवच का रूप ले लिया। उन्होंने ब्रह्मास्त्र की प्रखर ऊर्जा को अपने पर ले लिया और भीतर पल रहे बालक—भविष्य के राजा परीक्षित—की रक्षा की। यह प्रसंग इस तथ्य को उजागर करता है कि श्रीकृष्ण केवल मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि संकट के क्षणों में साक्षात् रक्षक भी हैं।
महाभारत के वर्णन के अनुसार, ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से उत्तरा ने मृत शिशु को जन्म दिया। किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने अपने स्पर्श और कृपा से उस बालक को पुनः जीवनदान दिया। यही बालक आगे चलकर पराक्रमी राजा परीक्षित बना, जिसने पांडवों की परंपरा और धर्म की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाया।
यह कथा न केवल पौराणिक इतिहास की अद्भुत घटना है, बल्कि यह भक्त और भगवान के बीच सुरक्षा-संबंध का गहरा संदेश भी देती है—जहां विश्वास अडिग हो, वहां दिव्य संरक्षण भी अटल होता है। श्रीकृष्ण द्वारा गर्भ में ही परीक्षित की रक्षा का प्रसंग आज भी अगणित भक्तों के हृदय में आशा, आस्था और सुरक्षा का भाव जगाता है।
